भारत में आर्यों के आगमन की जानकारी का मुख्य स्त्रोत ऋग्वेद है |
आर्यों ने सर्वप्रथम सप्त सैन्धव प्रदेश में बसना आरम्भ किया था, ऋग्वेद में जिन नदियों का उल्लेख मिलता है | ये हैं – सिन्धु, सरस्वती, शुतुद्रि, विपासा, परुष्णी, वितस्ता तथा अस्किनी |
ऋग्वेद में आर्यों के पांच काबिले होने की वजह से उसे “पंजन्य” कहा गया ये है – पुरू, यदु, अनु, तुर्वशु एवं द्र्स्यु | भरत, किवि, त्रित्स शासक आर्य वंश के थे |
भरत कुल के नाम से ही देश का नाम ‘भारत वर्ष’ पड़ा इनके पुरोहित वशिष्ट मुनि थे |
ऋग्वेद अग्नि, मित्र, वरुण, इंद्र आदि देवताओं को समर्पित ग्रन्थ हैं ऋग्वेद का पाठ करने वाले ब्राह्मण को होतृ कहा जाता था |
ऋग्वैदिक काल की सर्वाधिक महत्वपूर्ण नदी के रूप में सिन्धु व सरस्वती का नाम आता है |
असतो माँ सद्गमय वाक्य ऋग्वेद से लिया गया है |
ऋग्वैदिक काल में गंगा तथा यमुना का उल्लेख बहुत कम हुआ है |
ऋग्वैद के सबसे महत्वपूर्ण देवता इन्द्र थे, जिन्हें आर्यों का युद्ध नेता व वर्षा का देवता माना जाता है |
ऋग्वैदिक काल में राजकीय कार्यों में राजा की सहायता के लिए अनेक पदाधिकारी थे जिनमे सेनापति, पुरोहित, पुरप स्प्ररा व दूत उल्लेखनीय है | पुरप दुर्गपति होते थे, जबकि स्प्ररा गुप्तचर होते थे |
ऋग्वेद में विवाह एक उच्च एवं पवित्र संस्कार समझा जाता था लेकिन जो लड़कियां दीर्घकाल तक अथवा आजीवन अविवाहित रहती थी ऐसी कन्याओं को ‘आमजू’ कहते थे |
ऋग्वैदिक काल में साधरणतया एक पत्नी व्रत की प्रथा ही प्रचलित थी |
ऋग्वैदिक काल में संगीत मनोविनोद का पूर्ण साधन था इसके तीन प्रकार थे –
(1) नृत्य
(2) गान
(3) वाध्य |
संगीत के अतिरिक्त घुड़दौड़, रथदौड तथा मल्लयुद्ध मनोरंजन के साधन थे, ऋग्वेद में द्यूतक्रीडा का भी वर्णन है |
ऋग्वैदिक सभ्यता ग्राम्य थी,तत्कालीन समाज की सबसे छोटी राजनितिक व सामाजिक इकाई थी |
ऋग्वैदिक आर्यों के जीवन में सर्वाधिक महत्वपूर्ण पशु गाय थी इस समय दक्षिणा में गाय का दान किया जाता था |
ऋग्वेद में गाय मुद्रा के रूप में प्रतिष्ठित थी, ऋग्वेद में इंद्र प्रतिमा का मूल्य 1 गाय कहा गया है |