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तुगलक वंश के शासक एवं उनका शासनकाल - गयासुद्दीन तुगलक, मुहम्मद बिन तुगलक तथा फिरोज तुगलक


मध्यकालीन भारतीय इतिहास
तुगलक वंश

गयासुद्दीन तुगलक (1320-1325 ई.) - गाजी मलिक अथवा तुगलक गाजी गयासुद्दीन तुगलक का काल समस्याओं से भरा था. तेलंगना के शासक प्रताप रूद्रदेव द्वारा खराज देने से इंकार करने पर अपने पुत्र जौना खां को भेजा. गयासुद्दीन ने स्वयं सैनिक अभियान बंगाल में विद्रोह दमन करने के लिए किया था. दिल्ली वापसी पर स्वागत समारोह में एक लकड़ी के भवन के गिरने से 1325 में उसकी मृत्यु हो गयी.

मुहम्मद बिन तुगलक (1325-1351 ई.) - 1325 में गयासुद्दीन तुगलक की मृत्यु के बाद उसका पुत्र जौना खां मुहम्मद बिन तुगलक की उपाधि धारण कर दिल्ली का सुलतान बना. उसने अपनी राजधानी दिल्ली से बदलकर देवगिरी की, लेकिन यह प्रयोग असफल रहा. मुहम्मद बिन तुगलक ने 1330 ई. में सांकेतिक मुद्रा चलाई. इसने मिश्रित कांसे के सिक्के जारी किये, परन्तु लोग इस नए प्रयोग को समझ न सके. 

लोगो ने जाली सिक्के बनाने शुरू कर दिए निराश होकर सुल्तान ने सांकेतिक मुद्रा बंद कर दी. मोरक्को का इब्नबतूता जो लगभग 1333 में भारत आया था उसे सुलतान ने दिल्ली का काजी नियुक्त किया. थट्टा की ओर जाते हुए 20 मार्च 1351 को सुलतान की मृत्यु हो गयी. उसके मरने पर इतिहासकार बंदायूनी ने कहा कि “सुलतान को उसकी प्रजा से और प्रजा को अपने सुलतान से मुक्ति मिल गयी|”

फिरोज तुगलक (1351-1388 ई.) - मुहम्मद बिन तुगलक की मृत्यु के पश्चात् 1351 ई. में दिल्ली का सुलतान फिरोज तुगलक बना. इसका काल राजनितिक एवं आर्थिक विकेंद्रीकरण का काल था. जहाँ तक हो सका सभी वर्ग के लोगो पर सरकारी नियंत्रण पर ढील दे दी गयी. पहले ब्राम्हाण जजिया कर से मुक्त थे, किन्तु फिरोज तुगलक ने उन पर भी इस कर का विस्तार किया. सुल्तान ने उलेमा की स्वीकृति से सिंचाई कर भी लगाया. 

सुलतान ने कई नहरों का निर्माण करवाया जिसमे हिसार फिरोजा की नहर महत्वपूर्ण थी. फिरोज तुगलक ने भूमि को ठेके पर देने की प्रथा का विस्तार किया. उसने फिरोजाबाद, दिल्ली में कोटला फिरोजशाह, फतेहाबाद, हिसार, जौनपुर और फिरोजपुर आदि नगरों की स्थापना की.

सुलतान ने शारीरिक यातनाओं की प्रथा को समाप्त कर दिया. जियाउद्दीन बरनी तथा शम्से शिराज अफीफ ने अपने ग्रन्थ उसी के संरक्षण में लिखे. सुल्तान ने “फतुहाते-फिरोजशाही” नाम से अपनी आत्मकथा लिखी. 1388 ई. में उसकी मृत्यु हो गयी.

तुगलक वंश का अंतिम शासक नासिरुद्दीन मुहम्मदशाह था उसने शासनकाल में 1398 में तैमूरलंग ने भारत पर आक्रमण किया था.                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                      

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गुप्तोत्तर काल के प्रमुख राजवंश - पुष्यभूति वंश, आंध्र सातवाहन वंश एवं चोल राजवंश

गुप्तोत्तर काल

 पुष्यभूति वंश, आंध्र सातवाहन वंश एवं चोल राजवंश


पुष्यभूति वंश – गुप्त साम्राज्य के विध्वंश के पश्चात् हरियाणा के अम्बाला जिले के थानेश्वर नामक स्थान पर पुष्यभूति वंश की स्थापना हुई. इसका संस्थापक पुष्यभूमि था, जो की 450 ई. के अनुमानित था. संभवतः प्रभाकर वर्धन इसका चौथा शासक था जिसके दो पुत्रो में बड़ा राज्य वर्ध्दन व् छोटा हर्षवर्धन एवं पुत्री राजश्री थी |

हर्षवर्धन – राज्य वर्धन के बाद लगभग 606 ई.में हर्षवर्धन थानेश्वर के सिंहासन पर बैठा | इसके साम्राज्य क्षेत्र में जालन्धर, पंजाब, कश्मीर, नेपाल एवं वल्लभी तक शामिल था. चीनी यात्री हेन्सांग करीब 630 से 640 ई. के बीच इसके समय भारत आया. हर्ष एक प्रतिष्ठित नाटककार एवं कवि भी था इसने नागानंद, प्रियदर्शिका एवं रत्नावली की रचना की. इसके दरबार मर बाणभट्ट जैसा विद्वान् था. हर्ष की राजधानी कन्नौज थी. वह स्वयं बौध्द (महायान) समर्थक होते हुए भी विष्णु एवं शिव की स्तुति करता था. हर्ष को चालुक्य वंश के शासक पुलकेशिन द्वितीय ने नर्मदा के तट पर हराया था. ऐहोल प्रशस्ति में इसका उल्लेख मिलता है |

आन्ध्र सातवाहन वंश – आंध्र सातवाहन वंश दक्षिण भारत के प्रमुख राजवंशों में माने जाते है विद्वानों के अनुसार इनका क्षेत्र आधुनिक आंध्रप्रदेश में फैला था. इस वंश का प्रथम राजा सिमुक (60-37 ई.पू.) माना जाता है इसने अपने वंश को मौर्यों की अधीनता से मुक्त किया | शातकर्णी प्रथम (27-17 ई.पू.) प्रारम्भिक राजाओ में सर्वाधिक महत्वपूर्ण था उसने साम्राज्य का सर्वाधिक विस्तार किया एवं उसे गोदावरी डेल्टा में प्रथम साम्राज्य स्थापित करने का श्रेय दिया जाता है |

हाल (20-24 ई.पू.) ने सातवाहनो की क्षमता को पुनः स्थापित किया उसने गाथा सप्तशती नामक पुस्तक की भी रचना की. प्रसिध्द साहित्यकार गुणाढ्य उसके दरबार में थे |


गौतमी पुत्र शातकर्णी (106-131 ई.) इस वंश का एक महान शासक था. वह इस वंश का पहला शासक था जिसने अपने नाम के साथ अपनी माँ का नाम जोड़ा इसकी राजनैतिक उपलब्धिया नासिक प्रशस्ति में लिखीं हुई है. इसके शासन के अंतिम समय में शकों के आक्रमण हुए, जिन्होंने बहुत सारे क्षेत्र पर आधिकार भी कर लिया | यज्ञ श्री शातकर्णी इस वंश का अंतिम शासक था | 195 ई.स. में इसकी मृत्यु के पश्चात सातवाहनो का पतन शुरू हो गया |

चोल वंश - चोल वंश का तीसरी व चौथी शताब्दी में पांड्य तथा चेर वंशीय शासको के उत्कर्ष के कारण पतनं हो गया और नवी शताब्दी के पूर्वार्ध्द में पल्लवों की शक्ति क्षीण होने के बाद एक बार पुनः चोल वंश का उदय हुआ | पुनः चोल वंश की स्थापना का श्रेय विजयालय (850-871 ई.) को जाता है. आदित्य प्रथम परान्तक प्रथम, राजराज प्रथम, राजाधिराज प्रथम, राजेन्द्र द्वितीय, वीर राजेन्द्र, कुलोतुंग आदि इस वंश के प्रमुख नरेश हुए |

विजयालय ने तंजौर को अपनी राजधानी बनाया. राजराज प्रथम चोल वंश के शक्तिशाली नरेशो में से एक था. इसने तंजौर में भगवन शिव का विशाल मंदिर निर्मित कराया, जो कालान्तर में राज राजेश्वर के नाम से प्रसिध्द हुआ. उसने पांड्य तथा केरल में राजाओ को परास्त कर दिया | उसने अपनी राजधानी गंगैकोंडचोलपुरम में एक विशाल मंदिर तथा एक राजप्रसाद का निर्माण कराया इस वंस के अंतिम शासक राजेन्द्र तृतीय को पांड्य शासको ने पराजित कर चोल वंश का अंत कर दिया 


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मौर्यकाल - मौर्य साम्राज्य का संस्थापक चन्द्रगुप्त मौर्य पुत्र बिन्दुसार एवं उनका शासन

 मौर्यकाल  



चन्द्रगुप्त मौर्य (321 से 298 ई.पू.) – चन्द्रगुप्त मौर्य, मौर्य वंश का संस्थापक था | उसने मगध के अंतिम नन्द वंश शासक घनानंद को पराजित कर मौर्य वंश की स्थापना की थी. इस कार्य में विष्णुगुप्त (चाणक्य या कौटिल्य) ने चन्द्रगुप्त की सहायता की थी. रूद्र दामन के जूनागढ़ अभिलेख में चन्द्रगुप्त नाम का उल्लेख मिलता है यूनानी इतिहासकारों में जस्टिन एन्ड्रोकोट्स नाम से सम्बंधित किया |

चन्द्रगुप्त ने सबसे पहले भारत की पश्चिमोत्तर सीमा को यूनानियों के कब्जे से मुक्त किया | 305 ई.पू. के लगभग में सेल्यूकस के साथ उसका युध्द हुआ चन्द्रगुप्त इस युध्द में विजयी हुआ एवं दोनों के बीच वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित हुए | सेल्यूकस ने काबुल, कांधार एवं हेरात चन्द्रगुप्त को सौंप दिया जिससे मौर्य साम्राज्य का विस्तार आफगानिस्तान तक हो गया | सेल्यूकस ने मेगस्थनीज नामक एक राजदूत भी चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में भेजा |



चन्द्रगुप्त मौर्य ने भारत में सबसे पहले केंद्रीकृत प्रशासनिक व्यवस्था लागु की उसके प्रशासन का वितरण कौटिल्य के “अर्थशास्त्र” में मिलता है उसके शहरी प्रशासन एवं सैनिक प्रशासन की जानकारी मेगस्थनीज की इंडिका से होती है |

अपने शासन के अंतिम चरण में चन्द्रगुप्त मौर्य ने भद्रबाहू से जैनधर्म की दीक्षा ग्रहण की तथा मैसूर, कर्नाटक के श्रवणबेलागोला में स्थित चन्द्रगिरी पहाड़ी पर उपवास करके अपना शरीर त्याग दिया |

बिन्दुसार (298 ई.पू. से 272 ई.पू.) – 298 ई. पू. में चन्द्रगुप्त के बाद उसका पुत्र बिन्दुसार गद्दी पर बैठा | यूनानी उसे अमित्रोकेट्स (अमित्रधात अर्थात शत्रु का नाश करने वाला) कहते थे | बिन्दुसार के शासनकाल की सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात थी – यूनानी शासकों से संबंधों का जारी रहना संभवतः सीरिया के सेल्युसिद सम्राट एंटियोकस प्रथम से उसका सम्पर्क था |
स्ट्रैबो के अनुसार , एंटियोकस प्रथम ने अपना राजदूत डायमेकस बिन्दुसार के दरबार में भेजा था प्लिनी के अनुसार, टोल्मी फिलाडेल्फस द्वितीय ने डायोनिमस को बिन्दुसार के दरबार में भेजा था



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मगध साम्राज्य का उत्थान या मगध साम्राज्य की नीव व स्थापना, शासक - हर्यक वंश, अजातशत्रु, शिशुनाग वंश एवं नन्द वंश

 मगध साम्राज्य का उत्थान 



हर्यक वंश (545 से 412 ई. पू.) – मगध साम्राज्य की महत्ता का वास्तविक संस्थापक राजा बिम्बसार था जो हर्यक कुल से सम्बंधित था | बिम्बसार ने लिच्छवि गणराज्य के शासक चेटक की पुत्री चेलना के साथ तथा कोसल नरेश प्रसेनजित की बहन महाकोशला के साथ वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित कर अपनी स्थिति को सुद्रढ़ किया. म्हाकोशाला के साथ शादी में उसे दहेज़ में काशी का प्रदेश प्राप्त हुआ |

बिम्बसार ने सर्वप्रथम अंग के राजा ब्रह्दत्त पर आक्रमण कर उसे मार डाला तथा अंग को मगध साम्राज्य में मिला लिया बिम्बसार ने 52 वर्ष तक राज्य किया बौध ग्रंथों के अनुसार बिम्बसार की मृत्यु अपने महत्वकांक्षी पुत्र आजातशत्रु के हाथों हुई |

आजातशत्रु (493 – 462 ई.पू.) – ने आरम्भ से ही विस्तार की निति अपनाई. बिम्बसार के प्रति अजातशत्रु के व्यव्हार से क्षुब्ध होकर कोशल नरेश प्रसेनजित ने काशी को मगध से वापस ले लिया जिसके बाद मगध का कोसल से युध्द हुआ , पहले तो कोसल नरेश की हार हुई किन्तु कुछ समय बाद दोनों पक्षों में संधि हो गई और अजातशत्रु को काशी का प्रदेश मिल गया |

अजातशत्रु के पश्चात् उसका पुत्र उद्यभद्र या उदयिन सम्राट बना इसके काल में पाटलिपुत्र को मगध साम्राज्य की राजधानी बनाया गया उदय भद्र की मृत्यु के पश्चात् इसके तीन उत्तराधिकारी हुए अनिरुध्द, मुण्डक तथा दर्शक, जो  की निर्बल शासक हुए |



शिशुनाग वंश (412 – 344 ई.पू.) – दर्शक के समय उत्त्पन्न अराजकता से असंतुष्ट होकर मगध की जनता ने विद्रोह कर दिया तथा शिशुनाग को गद्दी पर बैठाया जिसने शिशुनाग वंश की स्थापना की. शिशुनाग की अवन्ती विजय उसकी महान सफलता थी अवन्ती को मगध साम्राज्य में मिला लेने के बाद इसकी सीमा मालवा तक जा पहुंची | शिशुनाग ने मगध की राजधानी वैशाली में स्थापित किया. शिशुनाग के पश्चात् उसका पुत्र कालाशोक सम्राट बना इसके शासनकाल में वैशाली में बौध्द धर्म की द्वितीय संगीति आयोगित की गयी | नन्दिवर्धन या महानंदीन शिशुनाग वंश का अंतिम शासक हुआ |



नंदवंश (344 -324 ई.पू.) – मगध की सत्ता शिशुनाग वंश के पश्चात् नन्द वंश के हाथ में आ गयी नन्द वंश का संस्थापक महापद्मनंद था | नन्द वंश ने बिम्बसार तथा अजातशत्रु द्वारा डाली गयी नीव पर प्रथम वृहत मगध साम्राज्य की स्थापना की इन्होने पाटलिपुत्र को समस्त उत्तरी भारत का केंद्र बना दिया इस वंश का अंतिम शासक घनानंद था जिसको मारकर चन्द्रगुप्त मौर्य ने मौर्य वंश की स्थापना की |  
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महत्वपूर्ण बौध्द संगीतियां उनके स्थान, समय, शासनकाल, अध्यक्ष एवं उद्देश्य


प्रथम बौध्द संगीति

स्थान     – सप्तपर्णी विहार (राजगृह)
समय     – 483 बी.सी.
शासनकाल – अजातशत्रु
अध्यक्ष    – महाकश्यप
कार्य      – बुध्द की शिक्षाओं को सुतपिटक व विनय पिटक में संकलन किया गया

द्वितीय बौध्द संगीति

स्थान     – वैशाली
समय     – 383 बी. सी.
शासनकाल – काला शोक
अध्यक्ष    –   साबकमीर सर्वकमी
कार्य      – संघ का स्थाविर एवं महासान्धिक में विभाजन



तृतीय बौध्द संगीति

स्थान     – पाटलिपुत्र
समय     – 251 बी. सी.
शासनकाल – अशोक
अध्यक्ष    –  मोगलिपुत्र तिस्स
कार्य      – अभिधम्मपिटक का संकलन एवं भेद अलग – अलग रोकने हेतु कठोर नियम

 
चतुर्थ बौध्द संगीति

स्थान       – कुण्डलवन
समय       – प्रथम शती ई.
शासनकाल   – कनिष्क
अध्यक्ष      –  वसुमित्र
उपाध्क्ष      – अश्वघोष
विशेष अतिथि – नागार्जुन
धर्म         – विभाषाशास्त्र नामक टीका का संस्कृत में संकलन तथा संघ का हीनयान महायान में विभाजन


पंचम बौध्द संगीति

स्थान     – कन्नौज
समय     – सातवीं सदी के लगभग
शासनकाल – हर्षवर्धन
अध्यक्ष    –  हेन्सांग
कार्य      – महायान सम्प्रदाय की श्रेष्ठता स्थापित, कन्नौज में विशाल संघ सभा का निर्माण

षष्ठी बौध्द संगीति

स्थान     – कन्नौज
समय     – सातवी सदी
शासनकाल – हर्षवर्धन
अध्यक्ष    –  हेन्सांग
कार्य      – बुध्द, सूर्य एवं शिव तीनो देवताओं की आराधना






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वैदिककाल - उत्तर वैदिककाल एवं इसकी विशेषताएँ

2   उत्तर वैदिककाल – भारतीय इतिहास में उस काल को जिसमे सामवेद, यजुर्वेद एवं अथर्ववेद तथा ब्राह्मण ग्रंथों, अरण्यकों एवं उपनिषद की रचना हुई को उत्तर वैदिक् काल कहते है |


वैदिक कालीन नदियाँ एवं उनके वर्तमान नाम 

प्राचीन नाम           आधुनिक नाम
सिन्धु                सिंध
विपासा               व्यास
वितस्ता              झेलम
सदानीरा              गंडक
कुभू                कुर्रम
गोमती              गोमल
सुवस्तू              स्वात
अस्कनी             चिनाब
परुष्णी              रावी
शातुद्री              सतलज
कुभा                काबुल
दृषद्वती            घग्घर



इसकी महत्वपूर्ण विशेषताएँ –

(i)                  उत्तर वैदिक काल (1000 – 600 ई.पू.) में लोगो का मुख्य व्यवसाय कृषि था तथा लोहे का ज्ञान हो चूका था , इसके अलावा दुसरे स्थान में पशुपालन था |
(ii)                दास शब्द का सर्वप्रथम उल्लेख अथर्ववेद में मिलता है |
(iii)               अथर्ववेद में कुरु राजा परीक्षित के बारे में विस्तृत जानकारी मिलती है |
(iv)              चारों आश्रमों की प्रथम जानकारी जाबालोपनिषद से मिलती है | ये आश्रम है – ब्रमचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, एवं सन्यास
(v)                उत्तर वैदिककाल में चावल का उल्लेख पहली बार मिलता है और इसको व्रीहि कहा गया है |
(vi)              अथर्ववेद में परीक्षित को ‘मृत्युलोक का देवता’ कहा गया है |
(vii)             पुरुषार्थ चार प्रकार के थे – धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष

(viii)           उत्तरवैदिक काल में 14 पुरोहितों की जगह का उल्लेख मिलता है | 
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वैदिक संस्कृति या वैदिक काल का विभाजन - ऋग्वैदिक काल

वैदिक संस्कृति युग 


सिन्धु सभ्यता के पतन के बाद आर्यों की नवीन सभ्यता का विकास हुआ, जिसके विषय में हमे सम्पूर्ण जानकारी वेदों से मिलती है इसलिए इस काल को वैदिक काल के नाम से जाना जाता है | आर्य एक अत्यंत ही श्रेष्ठ एवं सुसंस्कृत जाति थी | आर्यों के मूल निवास के संदर्भ में विभिन्न ने अलग-अलग मत व्यक्त किये है |आर्यों के निवास सम्बंधित मत


आदिस्थल          मत
मध्य एशिया    - मैक्समुलर
यूरोप          - सर्विलियम जोन्स
आर्कटिक प्रदेश  - बाल गंगाधर तिलक
तिब्बत        - स्वामी दयानंद सरस्वती
हंगरी          - प्रो. गाइल्स
सप्त सैधव क्षेत्र  - डा. अविनाश चन्द्र

वैदिक काल को दो कालों ऋग्वैदिक काल व उत्तर वैदिक काल में विभाजित किया जाता है |

(1)    ऋग्वैदिक काल – (1500-1000 बी.सी.) - इस काल में लोगों को लोहे का ज्ञान नही हुआ और वे कृषि बजाएँ मुख्यतः  पशुपालन पर निर्भर थे |




भारत में आर्यों के आगमन की जानकारी का मुख्य स्त्रोत ऋग्वेद है |




आर्यों ने सर्वप्रथम सप्त सैन्धव प्रदेश में बसना आरम्भ किया था, ऋग्वेद में जिन नदियों का उल्लेख मिलता है | ये हैं – सिन्धु, सरस्वती, शुतुद्रि, विपासा, परुष्णी, वितस्ता तथा अस्किनी |




ऋग्वेद में आर्यों के पांच काबिले होने की वजह से उसे “पंजन्य” कहा गया ये है – पुरू, यदु, अनु, तुर्वशु एवं द्र्स्यु | भरत, किवि, त्रित्स शासक आर्य वंश के थे |




भरत कुल के नाम से ही देश का नाम ‘भारत वर्ष’ पड़ा इनके पुरोहित वशिष्ट मुनि थे |




ऋग्वेद अग्नि, मित्र, वरुण, इंद्र आदि देवताओं को समर्पित ग्रन्थ हैं ऋग्वेद का पाठ करने वाले ब्राह्मण को होतृ कहा जाता था |



ऋग्वैदिक काल की सर्वाधिक महत्वपूर्ण नदी के रूप में सिन्धु व सरस्वती का नाम आता है |




असतो माँ सद्गमय वाक्य ऋग्वेद से लिया गया है |




ऋग्वैदिक काल में गंगा तथा यमुना का उल्लेख बहुत कम हुआ है |




ऋग्वैद के सबसे महत्वपूर्ण देवता इन्द्र थे, जिन्हें आर्यों का युद्ध नेता व वर्षा का देवता माना जाता है |



ऋग्वैदिक काल में राजकीय कार्यों में राजा की सहायता के लिए अनेक पदाधिकारी थे जिनमे सेनापति, पुरोहित, पुरप स्प्ररा व दूत उल्लेखनीय है | पुरप दुर्गपति होते थे, जबकि स्प्ररा गुप्तचर होते थे |




ऋग्वेद में विवाह एक उच्च एवं पवित्र संस्कार समझा जाता था लेकिन जो लड़कियां दीर्घकाल तक अथवा आजीवन अविवाहित रहती थी ऐसी कन्याओं को ‘आमजू’ कहते थे |




ऋग्वैदिक काल में साधरणतया एक पत्नी व्रत की प्रथा ही प्रचलित थी |



ऋग्वैदिक काल में संगीत मनोविनोद का पूर्ण साधन था इसके तीन प्रकार थे – 
(1) नृत्य 
(2) गान
 (3) वाध्य | 

संगीत के अतिरिक्त घुड़दौड़, रथदौड तथा मल्लयुद्ध मनोरंजन के साधन थे, ऋग्वेद में द्यूतक्रीडा का भी वर्णन है |



ऋग्वैदिक सभ्यता ग्राम्य थी,तत्कालीन समाज की सबसे छोटी राजनितिक व सामाजिक इकाई थी |

ऋग्वैदिक आर्यों के जीवन में सर्वाधिक महत्वपूर्ण पशु गाय थी इस समय दक्षिणा में गाय का दान किया जाता था |

ऋग्वेद में गाय मुद्रा के रूप में प्रतिष्ठित थी, ऋग्वेद में इंद्र प्रतिमा का मूल्य 1 गाय कहा गया है |
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प्राचीन भारत का इतिहास - प्राचीन भारत के इतिहास के स्त्रोत

𓀠⋯ भारत का इतिहास 𓀠⋯


काल की दृष्टि से भारतीय इतिहास को तीन भागों में बांटा गया है -
(3) आधुनिक भारत

इस लेख में हम प्राचीन भारत के बारें में जानेंगे  


 प्राचीन भारत

प्राचीन भारत के इतिहास के स्त्रोत – 
भारतीय इतिहास की जानकारी मुख्यत चार स्त्रोतों से प्राप्त होती है |

  • धर्म ग्रन्थ
  • ऐतिहासिक एवं समसामयिक ग्रन्थ
  • विदेशियों का विवरण
  • पुरातत्व सम्बन्धी साक्ष्य




(1) हमारे प्राचीन धर्म ग्रन्थ


धर्म प्रधान देश होनें के कारण भारत में तीन धार्मिक धाराएं – वैदिक, जैन एवं बौध प्रवाहित हुई |

वैदिक साहित्य 

 वैद शब्द का अर्थ ज्ञान से है, अर्थात पवित्र आध्यात्मिक ज्ञान से है |  वेदों के रचियता महर्षि वेदव्यास को माना गया है | वेदों से ही हमें आर्यों के बारें में जानकारी मिलती है | कुछ लोग वेदों को देवकृत मानते है | वेदों की कुल संख्या चार है – ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद एवं अथर्ववेद |

ऋग्वेद :- चारों वेदों में सबसे प्राचीन ऋग्वेद है ऋग्वेद अर्थात ऐसा ज्ञान जो ऋचाओ में क्रमबद्ध हो | इस वेड में कुल 10 मंडल, 8 अष्टक एवं 1028 सूक्त है | ऋग्वेद में गायत्री मंत्र का भी उल्लेख किया गया है | इसका उपवेद आयुर्वेद है |

सामवेद :- सैम शब्द का अर्थ है गान | सामवेद में मन्त्रों को देवताओं की स्तुति के समय गाया जाता था | सामवेद में कुल 1549 ऋचाएं है जिनमे 75 के अतिरिक्त शेष ऋग्वेद से ली गयी है | सामवेद का प्रमुख देवता सूर्य है | इसका उपवेद गन्धर्व वेद है |

यजुर्वेद : - यजुर्वेद शब्द का अर्थ यज्ञ से है | इस वेड में अनेक प्रकार के यज्ञों को संपन्न कराने की विधियों का उल्लेख है | यह गद्य तथा पद्य दोनों में लिखा गया है | इसका उपवेद धनुर्वेद है |


अथर्ववेद :- इस वेद की रचना अथर्वा ऋषि द्वारा की गयी है अतः उनके नाम पर ही इसे “अथर्ववेद” कहते है | इसका उपवेद अर्थवेद (शिल्पवेद) है | इस वेद में कुल 20 मंडल, 731 सूक्त एवं 5839 मंत्र है | ब्रम्ह-विचार, भूत-प्रेत, औषधियां, जादू आदि से सम्बंधित मंत्र इस सहिंता से प्राप्त होते है |

ब्राह्मण ग्रन्थ – ऋषियों द्वारा गद्य में वेदों की , की गयी सरल व्याख्या को ब्राह्मण ग्रन्थ कहा जाता है |
प्रत्येक वेद के अपने – अपने ब्राह्मण होते है जेसे – ऋग्वेद के ऐतरेय एवं कौषितिकी ब्राह्मण, यजुर्वेद के शतपथ ब्राह्मण, सामवेद के पंचविश या तांडव ब्राह्मण एवं अथर्ववेद का गोपथ ब्राह्मण |

आरण्यक :- ये भी एक प्रकार के ग्रन्थ है जिनकी रचना बाद में की गयी है | इनमे आत्मा, मृत्यु तथा जीवन सम्बन्धी विषयों का वर्णन किया गया है | कौषितिकी और ऐतरेय ऋग्वेद के, तैतरीय कृष्ण, यजुर्वेद के आरण्यक है | सामवेद तथा अथर्ववेद के कोई आरण्यक नही है |



उपनिषद :- इसका शाब्दिक अर्थ है समीप बैठना अर्थात ब्राम्हविद्या को प्राप्त करने के लिए गुरु के समीप बैठना | प्रमुख उपनिषद है – ईश, केन, कठ, माण्डुक्य, तैतिरीय, ऐतरेय, श्वेताश्वर, बृहदारण्यक, कोषितिकी, मुण्डक, प्रश्न आदि | उपनिषदों की संख्या 108 है |वेदांग :- इसकी रचना वेदों का अर्थ ठीक तरह से समझने के लिए हुई थी |यह छः प्रकार का होता है –
  •      शिक्षा
  •      व्याकरण
  •      कल्प
  •      निरुक्त
  •      छंद
  •     ज्योतिष


स्मृति :- स्मृतियों को धर्म शास्त्र भी कहा जाता है | इनका उदय सूत्रों के बाद हुआ | स्मृतियों से मनुष्य के पुरे जीवन से सम्बंधित अनेक क्रियाकलापों के बारें में अनेक विधि निषेधों की जानकारी मिलती है | मनुस्मृति सबसे प्राचीन है |


 पुराण :- प्राचीन आख्यानों से युक्त ग्रन्थ को पुराण कहते है | इनकी संख्या 18 है इनमे ब्रम्हा, पद्म, विष्णु, वायु, भागवत, अग्नि, गरुण पुराण प्रमुख है |


हाकाव्य :- रामायण एवं महाभारत, भारतीय इतिहास के दो सर्वाधिक प्राचीन महाकाव्य हैं |1)      रामायण :- 

रामायण की रचना वाल्मीकि द्वारा पहली एवं दूसरी शताब्दी के उपरांत संस्कृत भाषा में की गई | वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण – बालकाण्ड, अयोध्याकाण्ड, अरण्यकाण्ड, किष्किन्धाकाण्ड, सुन्दरकाण्ड, युद्धकाण्ड एवं उत्तरकाण्ड नमक सात कांडों में बंटा हुआ है |2)      महाभारत :- 

महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित है | महाभारत में मूलतः 8800 श्लोक है तथा इसका नाम जयसन्हिता था | एक लाख होने पर यह शतसहस्त्री या महाभारत कहलाया |

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