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भारत पर अरबों का आक्रमण या तुर्कों का आक्रमण - महमूद गजनवी तथा मोहम्मद गोरी


भारत पर अरबों का आक्रमण


भारत पर प्रथम मुस्लिम आक्रमणकारी अरब थे 712 ई. में अरब के मोहम्मद बिन कासिम ने भारत पर आक्रमण करते हुए सिंध के राजा दाहिर को पराजित किया. मुहम्मद बिन कासिम का आक्रमण मुसलमानों द्वारा भारत पर राजनितिक प्रभुत्व स्थापित करने की प्रक्रिया का प्रारंभ था, जिसे आगे चलकर तुर्कों ने पूरा किया.

भारत पर तुर्क आक्रमण – सर्वप्रथम भारत में इस्लामी राज्य स्थापित करने का श्रेय तुर्कों को जाता है वे गजनी के राजवंश के थे. 932 ई. में अलप्तगीन द्वारा गजनी में स्वतंत्र राज्य की स्थापना की गयी इसके उत्तराधिकारी द्वारा भारत के प्रति अपनाई गयी आक्रमण की नीति से लेकर इसके उतराधिकारी सुबुक्तगीन द्वारा 986 ई. में पंजाब के राजा जयपाल पर किये गये आक्रमणकारी अभियान तक तुर्कों को भारत विजय में विशेष सफलता नही मिली थी. भारत में राज्य स्थापित करने वाला प्रथम मुगल शासक महमूद गजनवी था जो सुबुक्तगीन का उत्तराधिकारी था |

महमूद गजनवी – वह 998 ई. में गजनी की गद्दी पर बैठा. बगदाद के खलीफा अलकादिर बिल्लाह ने उसे “आमीन-उद-दौला” तथा “आमीन-उन्-मिल्लाह” की उपाधि प्रदान की. उसने सन 1000 से 1027 के बीच सत्रह बार भारत पर आक्रमण किये.

महमूद गजनवी का भारत पर प्रथम आक्रमण 1000 ई. में हुआ. उसने कुछ सीमांत किलों पर अधिकार कर लिया. 1001 में इसने पंजाब के राजा जयपाल को पराजित कर बंदी बना लिया . 1004 में महमूद ने रजा विजय पाल रे से भटिंडा जीत लिया. 1006 ई. में इसने मुस्लिम सुल्तान फ़तेह दाऊद को परास्त कर इसे भी अपने आधीन कर लिया. 1009 ई. में आनंदपाल से नगरकोट जीता. 1014 में महमूद का आक्रमण थानेश्वर पर हुआ, 1018 में मथुरा, 1019 में कन्नौज, बुंदेलखंड के चंदेल राजा गंड तथा विद्याधर तथा कालिंजर के शासक भी महमूद के हाथों पराजित हो गये.
पंजाब क बाहर महमूद गजनवी आ अंतिम आक्रमण 1026 में सोमनाथ (काठियावाड़) में हुआ जहाँ से उसने अपार धन लूटा,  भारत पर उसका अंतिम आक्रमण 1027 में जाटों पर हुआ इसके बाद 1030 ई. में महमूद गजनवी की मृत्यु हो गयी.

अलबरुनीं, फिरदोसी, फर्रुखी, उतबी इसके दरबार के रत्न थे महमूद को गाजी, मूर्तिभंजक और बुतशिकन पुकारा गया.

मुहम्मद गोरी – महमूद गजनवी के बाद मुहम्मद गोरी ने भारत पर आक्रमण किया उसका उद्देश्य भारत में भी अपना साम्राज्य विस्तार करना था. मुहम्मद गोरी का प्रथम आक्रमण 1175 ई. में मुल्तान पर हुआ 1178 ई. में इसका दूसरा आक्रमण बघेल राजा भीम द्वितीय पर हुआ भीम द्वितीय ने गोरी को बुरी तरह परास्त किया. यह भारत के हिन्दू राजाओं के हाथों गोरी की प्रथम पराजय थी. उसके बाद गोरी ने पंजाब पर आक्रमण किया तथा वहां के अंतिम शासक को बंदी बना लिया. 1191 ई. में तराइन के मैदान में हुए प्रथम युध्द में पृथ्वीराज चौहान ने गोरी को परास्त किया. 1192 ई. में मुहम्मद गोरी ने पुनः आक्रमण किया तराइन में यह मुकाबला हुआ इस युध्द में गोरी ने पृथ्वीराज चौहान को परास्त कर दिया तथा उसे बंदी बना लिया. 15 मार्च 1206 ई. में गोरी की गजनी जाते समय मार्ग में सिन्धु नदी के तट पर दंभक नामक स्थान पर नमाज अदा करते समय खोखर विद्रोहियों द्वारा हत्या कर दी गयी.

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उत्तर भारत के प्रमुख राजवंश - परमार वंश, सोलंकी वंश, सिसोदिया वंश, पाल वंश, सेन वंश

उत्तर भारत के प्रमुख राजवंश भाग - 2

परमार वंश, सोलंकी वंश, सिसोदिया वंश, पाल वंश, सेन वंश 

परमार वंश ‘उपेन्द्र’ इस वंश का संस्थापक थामालवा इसका शासन प्रदेश था. श्री हर्ष, वाकपतिमुंज, सिन्धुराज, भोज, जयसिंह, उदयादित्य इस वंश के अन्य शासक हुएश्री हर्ष इस वंश प्रथम स्वतंत्र शक्तिशाली शासक था , जिसने राष्ट्रकुटो को पराजित किया. राजा भोज इस वंश का सर्वाधिक प्रसिद्ध राजा थाउसने चिकित्सा, गणित, व्याकरण आदि पर अनेक ग्रन्थ लिखे. उसकी राजधानी धार थी.

सोलंकी वंश - गुजरात में इस वंश का संस्थापक ‘मूलराज’ प्रथम था. उसने अनेक मंदिरो का निर्माण कराया. भीम प्रथम, जयसिंह  सिद्धराज, कुमारपाल, भीम द्वितीय इस वंश के अन्य शासक हुए. भीम प्रथम  के शासनकाल में महमूद गजनवी ने सोमनाथ के मंदिर पर आक्रमण किया थाजयसिंह  सिद्धराज इस वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली एवं कुमारपाल इस वंश के अंतिम शासको में से था. इसकी मृत्यु के पश्चात् ही सोलंकी वंश का पतन प्रारम्भ हो गया.

सिसोदिया वंश – इस वंश के शासक अपने को सूर्यवंशी कहते थे. इनका शासन मेवाड़ पर था और चित्तौड़ इनकी राजधानी थी. राणा कुम्भा, राणा संग्रामसिंह तथा महाराणा प्रताप इस वंश के प्रतापी तथा प्रसिध्द राजा हुए. राणा कुम्भा ने अपनी विजयों के उपलक्ष्य में विजय स्तम्भ का निर्माण कराया.

पाल वंश  गोपाल को पाल वंश का संस्थापक माना जाता है, क्योकि इस वंश के शासकों ने नाम के अंत में पाल शब्द जुड़ा रहता था अता यह पाल वंश के नाम से जाना जाता है. धर्मपाल, देवपाल, नारायणपाल, महिपाल, नयनपाल, रामपाल आदि इस वंश के प्रमुख राजा हुए. गोपाल ने लगभग 45 वर्षों तक सफलतापूर्वक शासन किया. अपने शासन काल में उसने मगध पर भी अधिकार कर लिया महिपाल इस वंश का अंतिम प्रतापी शासक था. 

वह बौध धर्म का अनुयायी था. देवपाल इस वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक था, जिसने कामरूप (वर्तमान असम) तथा कलिंग पर अपना अधिकार कर लिया अंत में 12वी शताब्दी में सेन वंश के शासको ने पाल वंश का अंत कर दिया. विक्रमशिला विश्व विद्यालय की स्थापना इस वंश के धर्मपाल ने की थी.

सेन वंश – सामंत सेन, सेन वंश का संस्थापक था. विजय सेन, बल्लाल सेन, लक्ष्मण सेन इस वंश के अन्य शासक हुए,  जिन्होंने बंगाल व बिहार पर शासन किया विजय सेन इस वंश का महत्वाकांक्षी शासक हुआ. वह शैवधर्म  का अनुयायी था. ‘देवपारा’ में उसने एक शिव मंदिर का निर्माण कराया, जो प्रद्युमनेश्वर के नाम से जाना जाता है. बल्लाल सेन भी इस वंश का उच्च कोटि का शासक विद्वान तथा प्रसिध्द लेखक था. इसने दानसागर लिखा तथा अद्भुत सागर का लेखन प्रारंभ किया लक्ष्मण सेन इस वंश का अंतिम प्रसिध्द राजा था. गीतगोविन्द के रचियता जयदेव इसका दरबारी कवि था.

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उत्तर भारत के प्रमुख राजवंश - गुर्जर प्रतिहार वंश, गहडवाल वंश, चौहान वंश, कलचुरी वंश एवं चंदेल वंश

उत्तर भारत के प्रमुख राजवंश भाग - 1

गुर्जर प्रतिहार वंश, गहडवाल वंश, चौहान वंश, कलचुरी वंश एवं चंदेल वंश 


गुर्जर प्रतिहार वंश – नागभट्ट प्रथम ने मालवा में गुर्जर प्रतिहार वंश के प्रथम शासक के रूप में आठवी शताब्दी में शासन किया. देवराज, वत्सराज तथा नागभट्ट द्वितीय इस वंश के अन्य प्रसिध्द शासक हुए. मिहिर भोज प्रतिहार वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली एवं प्रतापी सम्राट था. 

इसने अपने शासनकाल में कन्नौज को अपनी राजधानी बनाया. महेंद्र पाल तथा महिपाल ने इस वंश के अन्य शासक हुए. महिपाल की मृत्यु होने पर इस वंश का अंत हो गया. 1090 ई. के लगभग इस राज्य पर राठौर वंश के राजपूतों ने अपना अधिकार कर लिया. इस वंश के प्रथम शासक चंद्रदेव ने कन्नौज पर अधिकार कर गहडवाल वंश की स्थापना की थी तथा अपने राज्य का यमुना-गंगा के दोआब तक विस्तार कर लिया | 

गहडवाल वंश – चंद्रदेव इस वंश का संस्थापक था. इसने वाराणसी को अपनी राजधानी बनाया और शीघ्र ही उसने प्रतिहारों का अंत कर कन्नौज पर अपना अधिकार कर लिया. गोविन्द चन्द्र इस वंश का सर्वाधिक प्रशिध्द एवं प्रतापी शासक था. उसके शासनकाल में लक्ष्मीधर ने ‘कल्प्दुभ’ नामक विधि ग्रन्थ की रचना की. जयचंद्र इस वंश का अंतिम शक्तिशाली शासक था. 1194 में चंदवर के युध्द में मोहम्मद गौरी से पराजित होकर जयचंद मारा गया | 

चौहान वंश – दिल्ली तथा अजमेर उत्तरी भारत का सर्वाधिक शक्तिशाली राज्य था जिस पर चौहान वंश का अधिकार था. विग्रह राज द्वितीय, अजयराज, विग्रह राज चतुर्थ, बीसलदेव, पृथ्वीराज द्वितीय तथा पृथ्वीराज तृतीय (चौहान) इस वंश के प्रमुख शासक थे. 

पृथ्वी राज चौहान इस वंश का वीर, प्रतापी एवं अंतिम शासक था जिसका मोहम्मद गौरी के साथ तराइन का प्रथम एवं द्वितीय युध्द हुआ. द्वितीय युध्द में पृथ्वीराज चौहान परास्त हुआ और उत्तरी भारत में पहली बार मुगलों का राज्य स्थापित हुआ |इसके दरबार में प्रसिध्द कवि चंदबरदाई था जिसने ‘पृथ्वीराज रासो’ लिखी |

 कलचुरी वंश – इस वंश का संस्थापक कोकल्ल था. इसने ‘त्रिपुरी’ को अपनी राजधानी बनाकर शासन किया. इसकी दूसरी शाखा की राजधानी ‘रतनपुर’ थी. लक्ष्मण राज, गांगेयदेव, लक्ष्मिकोर्ण इस वंश के अन्य शासक हुए. रंगदेव इस वंश का शक्तिशाली शासक था इसने ‘विक्रमादित्य’ की उपाधि धारण की. 13वी शताब्दी में इस वंश की शक्ति अत्यंत क्षीण हो गयी और अब इस वंश का राज्य जबलपुर तथा आस-पास के प्रदेशों तक ही सिमित रह गया. 15वी शताब्दी के आरम्भ में गोंडो ने इनकी रही शक्ति को नष्ट कर दिया |

 चंदेल वंश – यशोवर्मन इस वंश का प्रथम प्रतापी एवं स्वतन्त्र शासक था जिसने बुंदेलखंड का राज्य कन्नौज के प्रतिहारो की दुर्बलता का लाभ उठाकर प्राप्त किया. उसने महोबा को अपनी राजधानी बनाया. 

उसने कन्नौज पर आक्रमण कर प्रतिहार राजा देवपाल को परास्त किया. धंग, गंड, कीर्तिवर्मन, मदनवर्मन तथा परमल इस वंश के अन्य शासक हुए. कीर्तिवर्मन कला एवं सहित्य का प्रेमी था, उसने महोबा के समीप ‘कीर्तिसागर’ नामक जलाशय का निर्माण कराया. परमल अथवा परमर्दन चंदेल वंश का अंतिम शासक था, जिसने 1202 ई. में कुतुबुद्दीन ऐबक की अधीनता स्वीकार कर ली और यही से चंदेल वंश का पतन प्रारम्भ हो गया. खुजराहो के मंदिर चंदेलों की ही दें है |    


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गुप्तोत्तर काल के प्रमुख राजवंश - राष्ट्रकूट वंश, चालुक्य वंश एवं पल्लव वंश


गुप्त्तोतर काल 

राष्ट्रकूट वंश, चालुक्य वंश एवं पल्लव वंश



राष्ट्रकूट वंश - चालुक्यो के पतन के बाद आठवी शाताब्दी के अंत में राष्ट्रकूटों के नरेश दन्तिदुर्ग ने अपनी सवतंत्र सत्ता स्थापित कर मान्यखेत को अपनी राजधानी बनाया कृष्ण प्रथम, गोविन्द द्वितीय, गोविन्द तृतीय तथा अमोघवर्ष प्रथम आदि इस वंश के प्रमुख शासक थे |
गोविन्द तृतीय इस वंश के प्रमुख शासको में से एक था, जिसने विस्तृत साम्राज्य की स्थापना की. कृष्ण तृतीय इस वंश का अंतिम महान शासक था. 973 ई. में चालुक्य राजा तैलप द्वतीय ने राष्ट्र्कूटो के राज्य पर अपना अधिकार कर लिया. अमोघवर्ष प्रथम द्वारा लिखित कविराजमार्ग तथा रत्न्मालिका इस समय के महत्वपूर्ण ग्रन्थ थे इसके अतिरिक्त इसी काल की अमोघवृति मुख्य साहित्यिक कृति है. जिन्सेने, शक्तायन विरार्चा इस काल के उच्च कोटि के लेखक, कवि एवं दार्शनिक थे. कृष्ण प्रथम के समय में निर्मित एलोरा का कैलाश मंदिर इस काल की स्थापत्य कला का सर्वोत्तम उदाहरण है |

चालुक्य वंश दक्षिण भारत में चालुक्य राजवंश की शाखाएँ थी –
(1) कल्याणी के चालुक्य 
(2) वातापी के चालुक्य 
(3) वेंगी के चालुक्य

(1) कल्याणी के चालुक्य (933-1190 ई.) – जिन चालुयकवंशी नरेशों ने हैदराबाद राज्य स्थित कल्याण को राजधानी बनाया, वे कल्याणी के चालुक्य के नाम से प्रशिध हुए. तैलप प्रथम, तैलप द्वतीय, विक्रमादित्य, सोमेश्वर प्रथम, सोमेश्वर द्वितीय, विक्रमादित्य षष्ठ, सोमेश्वर तृतीय तथा तैलप तृतीय आदि इस वंश के मुख्य शासक थे. लकुंडी का काशी विश्वेश्वर का मंदिर तथा इत्त्गी में महादेव मंदिर कला के कुछ सुंदर उदाहरण है |

विक्रमादित्य षष्ठ – इस वंश का सर्वाधिक प्रतापी राजा था प्रसिद्ध कश्मीरी कवि बिल्हण इसी के दरबार का अमूल्य रत्न था. इसी समय विज्ञानेश्वर ने हिन्दू कानून की प्रसिध्द पुस्तक मिताक्षरा की रचना की थी | तैलप तृतीय कल्याणी के चालुक्य वंश का अंतिम शासक था |

(2) वातापी के चालुक्य (535-753 ई.) – जिन चाल्युकों ने बीजापुर स्थित वातापी को अपनी राजधानी बनाया वे वातापी के चालुक्य कहलाये. जयसिंह नामक शासक ने इस वंश की नीव डाली. पुलकेशिन प्रथम, कीर्तिवर्मन, पुलकेशिन द्वितीय विक्रमादित्य, विजयादित्य आदि इस वंश के प्रमुख शासक हुए. वातापी स्थित मंगलेश का मंदिर इस काल की कला का उत्कृष्ठ उदाहरण है |
इसके अतिरिक्त मेंगुली का शिव मंदिर तथा एहोल का विष्णु मंदिर तो अविस्मरणीय है. रवि कीर्ति चालुक्यो के दरबार का महान कवि था. पुलकेशिन द्वितीय (610-642 ई.) इस वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक था. उसने उत्तरी भारत के सम्राट हर्ष को नर्मदा के तट पर बुरी तरह पराजित किया. पुलकेशिन द्वितीय के उत्तराधिकारी अयोग्य थे, अतः परिस्थितियों का लाभ उठाकर राष्ट्रकूटो ने इस वंश का अंत कर दिया |

(3) वेंगी के चालुक्य (615 से 1076 ई.) – जिन चालुक्यों ने आंध्रप्रदेश स्थित वेंगी को अपनी राजधानी बनाकर शासन किया वे वेंगी के चाल्युक कहलाये. विष्णुवर्धन इस राजवंश का संस्थापक था. जयसिंह प्रथम इन्द्र्वर्धन, विष्णुवर्धन द्वितीय, जयसिंह द्वितीय कोकिल, विष्णुवर्धन तृतीय आदि इस वंश के प्रमुख शासक हुए.
विजयादित्य इस वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक था.

पल्लव वंश – इनकी राजधानी कांची या कांचीपुरम में थी. इस राजवंश की स्थापना वप्पदेव के द्वारा हुई थी, इस राजवंश में सिंह विष्णु (575-600 ई.) एक प्रमुख राजा हुआ. महेंद्र वर्मन प्रथम (600-630 ई.) पुलकेशिन द्वितीय से पराजित हुआ. इसने मत्तविलास ‘प्रहसन’ नामक एक पुस्तक की रचना भी की थी |



पुष्यभूति वंश, आंध्र सातवाहन वंश एवं चोल राजवंश के बारे में पढ़े
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गुप्तोत्तर काल के प्रमुख राजवंश - पुष्यभूति वंश, आंध्र सातवाहन वंश एवं चोल राजवंश

गुप्तोत्तर काल

 पुष्यभूति वंश, आंध्र सातवाहन वंश एवं चोल राजवंश


पुष्यभूति वंश – गुप्त साम्राज्य के विध्वंश के पश्चात् हरियाणा के अम्बाला जिले के थानेश्वर नामक स्थान पर पुष्यभूति वंश की स्थापना हुई. इसका संस्थापक पुष्यभूमि था, जो की 450 ई. के अनुमानित था. संभवतः प्रभाकर वर्धन इसका चौथा शासक था जिसके दो पुत्रो में बड़ा राज्य वर्ध्दन व् छोटा हर्षवर्धन एवं पुत्री राजश्री थी |

हर्षवर्धन – राज्य वर्धन के बाद लगभग 606 ई.में हर्षवर्धन थानेश्वर के सिंहासन पर बैठा | इसके साम्राज्य क्षेत्र में जालन्धर, पंजाब, कश्मीर, नेपाल एवं वल्लभी तक शामिल था. चीनी यात्री हेन्सांग करीब 630 से 640 ई. के बीच इसके समय भारत आया. हर्ष एक प्रतिष्ठित नाटककार एवं कवि भी था इसने नागानंद, प्रियदर्शिका एवं रत्नावली की रचना की. इसके दरबार मर बाणभट्ट जैसा विद्वान् था. हर्ष की राजधानी कन्नौज थी. वह स्वयं बौध्द (महायान) समर्थक होते हुए भी विष्णु एवं शिव की स्तुति करता था. हर्ष को चालुक्य वंश के शासक पुलकेशिन द्वितीय ने नर्मदा के तट पर हराया था. ऐहोल प्रशस्ति में इसका उल्लेख मिलता है |

आन्ध्र सातवाहन वंश – आंध्र सातवाहन वंश दक्षिण भारत के प्रमुख राजवंशों में माने जाते है विद्वानों के अनुसार इनका क्षेत्र आधुनिक आंध्रप्रदेश में फैला था. इस वंश का प्रथम राजा सिमुक (60-37 ई.पू.) माना जाता है इसने अपने वंश को मौर्यों की अधीनता से मुक्त किया | शातकर्णी प्रथम (27-17 ई.पू.) प्रारम्भिक राजाओ में सर्वाधिक महत्वपूर्ण था उसने साम्राज्य का सर्वाधिक विस्तार किया एवं उसे गोदावरी डेल्टा में प्रथम साम्राज्य स्थापित करने का श्रेय दिया जाता है |

हाल (20-24 ई.पू.) ने सातवाहनो की क्षमता को पुनः स्थापित किया उसने गाथा सप्तशती नामक पुस्तक की भी रचना की. प्रसिध्द साहित्यकार गुणाढ्य उसके दरबार में थे |


गौतमी पुत्र शातकर्णी (106-131 ई.) इस वंश का एक महान शासक था. वह इस वंश का पहला शासक था जिसने अपने नाम के साथ अपनी माँ का नाम जोड़ा इसकी राजनैतिक उपलब्धिया नासिक प्रशस्ति में लिखीं हुई है. इसके शासन के अंतिम समय में शकों के आक्रमण हुए, जिन्होंने बहुत सारे क्षेत्र पर आधिकार भी कर लिया | यज्ञ श्री शातकर्णी इस वंश का अंतिम शासक था | 195 ई.स. में इसकी मृत्यु के पश्चात सातवाहनो का पतन शुरू हो गया |

चोल वंश - चोल वंश का तीसरी व चौथी शताब्दी में पांड्य तथा चेर वंशीय शासको के उत्कर्ष के कारण पतनं हो गया और नवी शताब्दी के पूर्वार्ध्द में पल्लवों की शक्ति क्षीण होने के बाद एक बार पुनः चोल वंश का उदय हुआ | पुनः चोल वंश की स्थापना का श्रेय विजयालय (850-871 ई.) को जाता है. आदित्य प्रथम परान्तक प्रथम, राजराज प्रथम, राजाधिराज प्रथम, राजेन्द्र द्वितीय, वीर राजेन्द्र, कुलोतुंग आदि इस वंश के प्रमुख नरेश हुए |

विजयालय ने तंजौर को अपनी राजधानी बनाया. राजराज प्रथम चोल वंश के शक्तिशाली नरेशो में से एक था. इसने तंजौर में भगवन शिव का विशाल मंदिर निर्मित कराया, जो कालान्तर में राज राजेश्वर के नाम से प्रसिध्द हुआ. उसने पांड्य तथा केरल में राजाओ को परास्त कर दिया | उसने अपनी राजधानी गंगैकोंडचोलपुरम में एक विशाल मंदिर तथा एक राजप्रसाद का निर्माण कराया इस वंस के अंतिम शासक राजेन्द्र तृतीय को पांड्य शासको ने पराजित कर चोल वंश का अंत कर दिया 


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भारतीय इतिहास का स्वर्ण युग गुप्तकाल एवं गुप्त साम्राज्य का वर्णन

स्वर्णिम युग गुप्त काल



मौर्य साम्राज्य के पतनोपरान्त उत्पन्न हुए दीर्घकालीन राजनीतिक विघटन के पश्चात् गुप्तकाल का उदय हुआ इसका उदय तीसरी सदी के अंत में प्रयाग के निकट कौशाम्बी में हुआ, गुप्त कुषाणों के सामंत थे | गुप्त वंश का प्रथम शासक व संस्थापक श्रीगुप्त (240 – 280 ई.) माना जाता है, जो संभवतः कुषाणों का सामंत था इसने केवल महाराज की उपाधि धारण की चीनी स्त्रोतों में इसे चेलिकोता कहकर पुकारा गया है | श्रीगुप्त के पश्चात् घटोत्कच गद्दी पर बैठा, जिसने महाराज की उपाधि धारण की उसके सन्दर्भ में ज्यादा ऐतिहासिक साक्ष्य उपलब्ध नही है |

चन्द्रगुप्त प्रथम (319-334 ई.)

गुप्त वंशावली में सबसे पहले शासक चन्द्रगुप्त प्रथम था जिसने महाराजाधिराज की उपाधि धारण की थी इसने लिच्छवि राजकुमारी कुमारदेवी के साथ विवाह किया था इस वैवाहिक सम्बन्ध से गुप्त साम्राज्य को आर्थिक एवं राजनैतिक लाभ के साथ – साथ अपूर्व प्रतिष्ठा प्राप्त हुई | गुप्त संवत (319-20 ई.) के प्रचलन का श्रेय तो चन्द्रगुप्त को है, इसने पूर्वी भारत में चांदी के सिक्को का प्रचलन भी करवाया था |

समुद्रगुप्त (334-375 ई.)

पिता चन्द्रगुप्त तथा माता लिच्छवि वंशीय कुमार देवी से उत्पन्न योग्य प्रशासक व महान विजेता समुद्रगुप्त भारतीय इतिहास का महानतम शासक था, ए.वी.स्मिथ ने इसे भारत का नेपोलियन कहा है |


प्रसिध्द कवि हरिषेण इसके दरबार में रहता था जिसने प्रयाग प्रशस्ति लेख में समुद्रगुप्त के विजयी अभियानों का उल्लेख किया है उसने अपनी विजयो की उद्घोषणा हेतु अश्वमेध यज्ञ संपन्न करवाया था | समुद्रगुप्त सर्वतोमुखी प्रतिभासंपन्न सम्राट था, महान योध्दा, प्रशासक होने के साथ – साथ वह एक महान संगीतज्ञ भी था जिसे वीणावादन का शौक था इसे कविराज की उपाधि भी मिली थी |

चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य (375-412 ई.) 

इसके काल में गुप्त साम्राज्य अपने उत्कर्ष की चोटी पर पहुँच गया इसने प्रसिध्द वाकाटक वंश में अपनी पुत्री प्रभावती गुप्त की शादी की. सिंहासन उपरांत चंद्रगुप्त ने शकों के खिलाफ एक व्यापक सैनिक अभियान किया जिसमे शक नरेश रुद्रसिंह तृतीय मारा गया | कठियावाड तथा मालवा के क्षेत्र गुप्त साम्राज्य में मिला लिए गए. इस विजय से गुप्त साम्राज्य को पश्चिमी समुद्रतट मिल गया जो व्यापार वाणिज्य के लिए मशहूर था | चन्द्रगुप्त द्वितीय का एक अन्य नाम देवराज या देवगुप्त भी था, उसने विक्रमादित्य की उपाधि धारण की | इसने उज्जयिनी को अपनी राजधानी बनाया इसके शासनकाल में चीनी यात्री फाह्यान (399-414 ई.) में भारत आया था | एक महान शासक होने के साथ ही चन्द्रगुप्त विद्वानों का आश्रयदाता था अनुश्रुति के अनुसार इसके दरबार में नवरत्नों की एक मण्डली निवास करती थी | इस नवरत्न मण्डली के विद्वान थे – कालिदास, धन्वन्तरी, क्षपणक, अमरसिंह, शंकु, वेतालभट्ट, घटकर्पर, वराहमिहिर, वरुचि आदि |

कुमार गुप्त (415–455 ई.) 

इसके शासनकाल की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि यह रही कि इसने अपने पैतृक साम्राज्य को अक्षुण्ण बनाये रखा | स्कंदगुप्त के भितरी अभिलेख से पता चलता है कि कुमार गुप्त के शासनकाल के अंतिम दिनों में पुष्यमित्रों ने आक्रमण कर दिया था जिन्हें उसके पुत्र स्कंदगुप्त ने विफल कर दिया |

स्कंदगुप्त (456-467 ई.) 

स्कंदगुप्त को अपने शासनकाल में हूणों के भयंकर आक्रमण का सामना करना पड़ा. इसमें स्कंदगुप्त को सफलता मिली | यह एक योग्य सैन्य संचालक होने के साथ ही साथ एक योग्य प्रशासक भी था इसने चन्द्रगुप्त मौर्य के समय निर्मित गिरनार पर्वत पर स्थित सुदर्शन झील पर स्थित बांध का पुनरुध्दार करवाया. स्कंदगुप्त की उपाधि शुक्रादित्य थी इन्होने सुदूर चीन के साथ मित्रतापूर्ण सम्पर्क बनाये रखा |



स्कंदगुप्त के बाद गुप्तवंश का तेजी से पतन हुआ बाद के शासको को विदेशी आक्रमण का सामना करना पड़ा यद्द्पि गुप्त साम्राज्य का पतन हो गया, परन्तु इसे भारतीय इतिहास का स्वर्णकाल या स्वर्णिम युग माना जाता है | इस काल में स्थापत्य कला, चित्रकला, धातुकला और साहित्य लेखन की कला की अभूतपूर्व प्रगति हुई, इस काल के साहित्यकारों में महाकवि कालिदास, भारवि, भट्टी, भास, शूद्रक प्रमुख थे. साँची और बोध गया में बौध्द मंदिर तथा सारनाथ का धमेख स्तूप गुप्तकालीन स्थापत्य के उदाहरण है | इस काल की चित्रकला के उदाहरण हमे अजंता (औरंगाबाद) और बाघ के निकट मिलते है |

"गुप्तकाल को भारतीय इतिहास का स्वर्ण युग कहा जाता है"

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मौर्योत्तर काल - भारत पर विदेशी आक्रमण , शक शासक,कुषाण वंश व कण्व वंश

भारत पर विदेशी आक्रमण


 मौर्योत्तर काल की अधिक महत्वपूर्ण घटना थी, उत्तर पश्चिम से विदेशियों का आक्रमण इनमे प्रमुख थे – 

शक शासक – शक मध्य एशिया से भारत आये थे भारत में प्रथम शक राजा था मग अथवा मोस | लगभग 58 ई.पू. उज्जैन में शासन करते हुए एक शक राजा का उल्लेख प्राप्त होता है. विक्रम संवत नाम का एक नया संवत 58 ई.पू. में शकों की विजय से आरम्भ हुआ. शक राजा अपने को क्षत्रप कहते थे | भारत में शकों की दो मुख्य शाखाएँ थी एक उत्तरी क्षत्रप जो तक्षशिला एवं मथुरा में थे और दुसरे पश्चिम क्षत्रप जो नासिक एवं उज्जैन के थे. उज्जयिनी का पहला स्वतंत्र शासक चष्टण था एवं सबसे अधिक विख्यात शक शासक उज्जयिनी का शक शासक रुद्रदामन (130-150 ई.) था | यह एक महान विजेता था इसके द्वारा मशहूर सुदर्शन झील का जीर्णोद्धार करवाया गया इस वंश का अंतिम राजा रुद्र्सिंह तृतीय था |

 कुषाण वंश – मौर्य वंश के पतन के लगभग दो शताब्दी बाद उत्तरी भारत में पुनः कुषाणों का साम्राज्य स्थापित हो गया. कुषाणों ने 100 वर्षों तक शासन किये. कुषाण यूची कबीले की एक शाखा थे. ये मध्य एशिया के एक – दुसरे कबीले से निकल आये थे इनके साम्राज्य का विस्तार मध्य एशिया में आक्सस नदी के उत्तर वाले इलाके म बनारस और संभवतः पाटलिपुत्र तक था |एसा ज्ञात होता है की कुषाणों के दो वंश कड्फिसियस नामक एक राजा ने चलाया था और 28 वर्षों तक शासन किया. दूसरे वंश में दो राजा हुए एक कड्फिसियस प्रथम दूसरा कड्फिसियस द्वितीय, इस वंश का प्रसिध्द सम्राट कनिष्क प्रथम था |



इसके राज्यारोहण की तिथि विवादास्पद है, लेकिन सबसे अधिक संभावित तिथि 78 ई. सन लगती है इसी साल एक नया संवत शुरू हुआ जो शक संवत के नाम से जाना जाता है | इसकी राजधानी पुरुषपुर (पेशावर) में थी. इसने कश्मीर को जीत कर वहां कनिष्कपुर नामक नगर बसाया तथा कश्मीर में बौध्दों की चौथी महासंगीति का आयोजन करवाया जिसका प्रधान वसुमित्र था |इसके दरबार में अश्वघोष नामक महान विद्वान भी था साथ ही चरक जैसे महान आयुर्वेदाचार्य थे | 


कण्व वंश – शुंगवंश के अंतिम सम्राट देवभूमि की हत्या करके उसके सचिव वसुदेव ई. पू. 75 में मगध में कण्व वंश की नीव रखी. इस वंश के राजाओं ने कुल 30 वर्ष तक राज्य किया. पुराणों के अनुसार आंध्र भ्रत्यों ने इनका उन्मूलन कर दिया |

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मौर्यकाल का सबसे महान सम्राट अशोक एवं मौर्यकालीन व्यवस्था तथा परवर्ती मौर्य सम्राट एवं पतन

सम्राट अशोक 

(The Great Ashoka)


अशोक (272 ई.पू. से 232 ई.पू.) – बिन्दुसार की मृत्यु की पश्चात्त उसका पुत्र अशोक मौर्य साम्राज्य की गद्दी पर बैठा. अशोक की गणना विश्व इतिहास के महानतम सम्राटों में होती है |
अशोक पहला भारतीय राजा हुआ जिसने अपने अभिलेखों के सहारे सीधे अपनी प्रजा को संबोधित किया उसके अभिलेखों में सर्वत्र उसे देवनाम प्रिय या देवनाम प्रियदर्शी उपाधियों से संबोधित किया गया है केवल मास्की और गुर्जरा के लेखों में उसका नाम अशोक मिलता है | सर्वप्रथम 1837 में जेम्स प्रिन्सेप ने अभिलेखों में उल्लेखित देवनाम प्रियदर्शी को अशोक के साथ समीकृत किया था. अशोक के अभिलेख ब्राम्ही व खरोष्ठी लिपि में मिलते है | 

बौध्द अनुश्रुतियों से पता चलता है कि अशोक ने अपने 99 भईयों को मारकर सिंहासन प्राप्त किया था, राजगद्दी पर बैठने के पश्चात् अशोक ने केवल एक युध्द किया जो कलिंग युध्द के नाम से प्रसिध्द है. यह युध्द 261 ई.पू. में हुआ था यह युध्द अशोक के जीवन की एक युगांतकारी घटना थी कलिंग युध्द में हुए अपार जनसंहार से अशोक की अंतरात्मा को तीव्र आघात पहुंचा उसने युध्द विजय की नीति को त्यागकर धम्य विजय की नीति को अपना लिया और व्यक्तिगत जीवन में उसने बौध्द धर्म को अपना लिया |



अशोक के राज्यकाल में पाटलिपुत्र में तृतीय बौध्द संगीति का आयोजन किया गया जिसकी अध्यक्षता मोगलिपुत्र तिष्य ने की | इस संगीति में अभिधम्य पिटक नामक बौध्द ग्रन्थ की रचना हुई उसने बौध्द धर्म के प्रचार हेतु अपने पुत्र महेंद्र एवं पुत्री संघमित्रा को श्रीलंका भेजा | अशोक के प्रयासों से बौध्द धर्म का देश-विदेश में प्रचार हुआ. अशोक ने नये धम्म प्रचार के लिए धम्म महामात्र नामक एक नये अधिकारी पद का सृजन किया तथा शिलालेख तथा स्तम्भ लेख जारी किये | उसके द्वारा 14 शिलालेख, तथा 7 स्तम्भ लेख और कई छोटे-छोटे शिलालेख एवं स्तम्भ लेख जारी किये गये. अभिलेखों के माध्यम से उसने अपनी प्रजा को धम्म का संदेश दिया |   
                                                    
परवर्ती मौर्य सम्राट – 232 ई.पू. के लगभग अशोक की म्रत्यु के पश्चात् मौर्य साम्राज्य का पतन आरम्भ हो गया अशोक के बाद के राजाओं के नाम और कम असंदिग्ध और अनिश्चित अवस्था में नही प्राप्त होते है | पुराणों के अनुसार अंतिम मौर्य सम्राट वृहद्रथ था, जिसकी हत्या उसके सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने की थी |



मौर्यकालीन व्यवस्था -  मौर्यकाल में शासन का कार्य भार मुख्यतः एक विशाल वर्ग पर था, जिन्हें अर्थशास्त्र में तीर्थ कहा गया है इनकी संख्या 18 थी इसके अलावा अर्थशास्त्र में विभिन्न विभागाध्यक्षों का उल्लेख प्राप्त होता है जिनकी संख्या 26 थी | मुख्य विभागाध्यक्ष थे – कोषाध्यक्ष, सीमाध्य्क्ष, पण्याध्यक्ष, पौतवाध्यक्ष, मुद्राध्यक्ष आदि |

पुष्यमित्र शुंग


184 बी.सी. में मौर्य वंश के अंतिम शासक वृहद्रथ की हत्या कर पुष्यमित्र शुंग ने मगध की गद्दी पर अधिकार कर लिया | पुराणों के अनुसार शुंग ब्राम्हण जाती के थे. पुष्यमित्र के शासनकाल की महत्वपूर्ण घटना अश्वमेध यज्ञ था | पतंजलि के अनुसार पुष्यमित्र ने दो बार अश्वमेघ यज्ञ का आयोजन किया जो एक महान शासक के रूप में उसकी सत्ता अभिव्यक्ति का प्रयास था | पुष्यमित्र पर बौध्द धर्म के विरोध और दमन का आरोप लगाया जाता है. पतंजलि की रचना महाभाष्य उसी समय की रचना है | कला के क्षेत्र में भरहुत का स्तूप उस काल की महत्वपूर्ण उपलब्धि है पुष्यमित्र की म्रत्यु 148 ई.पू.  में हुई, परन्तु इसके वंशजों का शासन 72 ई. पूर्व तक बना रहा उसके बाद कणववंश ने सत्ता पर अधिकार कर लिया |  

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मौर्यकाल - मौर्य साम्राज्य का संस्थापक चन्द्रगुप्त मौर्य पुत्र बिन्दुसार एवं उनका शासन

 मौर्यकाल  



चन्द्रगुप्त मौर्य (321 से 298 ई.पू.) – चन्द्रगुप्त मौर्य, मौर्य वंश का संस्थापक था | उसने मगध के अंतिम नन्द वंश शासक घनानंद को पराजित कर मौर्य वंश की स्थापना की थी. इस कार्य में विष्णुगुप्त (चाणक्य या कौटिल्य) ने चन्द्रगुप्त की सहायता की थी. रूद्र दामन के जूनागढ़ अभिलेख में चन्द्रगुप्त नाम का उल्लेख मिलता है यूनानी इतिहासकारों में जस्टिन एन्ड्रोकोट्स नाम से सम्बंधित किया |

चन्द्रगुप्त ने सबसे पहले भारत की पश्चिमोत्तर सीमा को यूनानियों के कब्जे से मुक्त किया | 305 ई.पू. के लगभग में सेल्यूकस के साथ उसका युध्द हुआ चन्द्रगुप्त इस युध्द में विजयी हुआ एवं दोनों के बीच वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित हुए | सेल्यूकस ने काबुल, कांधार एवं हेरात चन्द्रगुप्त को सौंप दिया जिससे मौर्य साम्राज्य का विस्तार आफगानिस्तान तक हो गया | सेल्यूकस ने मेगस्थनीज नामक एक राजदूत भी चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में भेजा |



चन्द्रगुप्त मौर्य ने भारत में सबसे पहले केंद्रीकृत प्रशासनिक व्यवस्था लागु की उसके प्रशासन का वितरण कौटिल्य के “अर्थशास्त्र” में मिलता है उसके शहरी प्रशासन एवं सैनिक प्रशासन की जानकारी मेगस्थनीज की इंडिका से होती है |

अपने शासन के अंतिम चरण में चन्द्रगुप्त मौर्य ने भद्रबाहू से जैनधर्म की दीक्षा ग्रहण की तथा मैसूर, कर्नाटक के श्रवणबेलागोला में स्थित चन्द्रगिरी पहाड़ी पर उपवास करके अपना शरीर त्याग दिया |

बिन्दुसार (298 ई.पू. से 272 ई.पू.) – 298 ई. पू. में चन्द्रगुप्त के बाद उसका पुत्र बिन्दुसार गद्दी पर बैठा | यूनानी उसे अमित्रोकेट्स (अमित्रधात अर्थात शत्रु का नाश करने वाला) कहते थे | बिन्दुसार के शासनकाल की सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात थी – यूनानी शासकों से संबंधों का जारी रहना संभवतः सीरिया के सेल्युसिद सम्राट एंटियोकस प्रथम से उसका सम्पर्क था |
स्ट्रैबो के अनुसार , एंटियोकस प्रथम ने अपना राजदूत डायमेकस बिन्दुसार के दरबार में भेजा था प्लिनी के अनुसार, टोल्मी फिलाडेल्फस द्वितीय ने डायोनिमस को बिन्दुसार के दरबार में भेजा था



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मगध साम्राज्य का उत्थान या मगध साम्राज्य की नीव व स्थापना, शासक - हर्यक वंश, अजातशत्रु, शिशुनाग वंश एवं नन्द वंश

 मगध साम्राज्य का उत्थान 



हर्यक वंश (545 से 412 ई. पू.) – मगध साम्राज्य की महत्ता का वास्तविक संस्थापक राजा बिम्बसार था जो हर्यक कुल से सम्बंधित था | बिम्बसार ने लिच्छवि गणराज्य के शासक चेटक की पुत्री चेलना के साथ तथा कोसल नरेश प्रसेनजित की बहन महाकोशला के साथ वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित कर अपनी स्थिति को सुद्रढ़ किया. म्हाकोशाला के साथ शादी में उसे दहेज़ में काशी का प्रदेश प्राप्त हुआ |

बिम्बसार ने सर्वप्रथम अंग के राजा ब्रह्दत्त पर आक्रमण कर उसे मार डाला तथा अंग को मगध साम्राज्य में मिला लिया बिम्बसार ने 52 वर्ष तक राज्य किया बौध ग्रंथों के अनुसार बिम्बसार की मृत्यु अपने महत्वकांक्षी पुत्र आजातशत्रु के हाथों हुई |

आजातशत्रु (493 – 462 ई.पू.) – ने आरम्भ से ही विस्तार की निति अपनाई. बिम्बसार के प्रति अजातशत्रु के व्यव्हार से क्षुब्ध होकर कोशल नरेश प्रसेनजित ने काशी को मगध से वापस ले लिया जिसके बाद मगध का कोसल से युध्द हुआ , पहले तो कोसल नरेश की हार हुई किन्तु कुछ समय बाद दोनों पक्षों में संधि हो गई और अजातशत्रु को काशी का प्रदेश मिल गया |

अजातशत्रु के पश्चात् उसका पुत्र उद्यभद्र या उदयिन सम्राट बना इसके काल में पाटलिपुत्र को मगध साम्राज्य की राजधानी बनाया गया उदय भद्र की मृत्यु के पश्चात् इसके तीन उत्तराधिकारी हुए अनिरुध्द, मुण्डक तथा दर्शक, जो  की निर्बल शासक हुए |



शिशुनाग वंश (412 – 344 ई.पू.) – दर्शक के समय उत्त्पन्न अराजकता से असंतुष्ट होकर मगध की जनता ने विद्रोह कर दिया तथा शिशुनाग को गद्दी पर बैठाया जिसने शिशुनाग वंश की स्थापना की. शिशुनाग की अवन्ती विजय उसकी महान सफलता थी अवन्ती को मगध साम्राज्य में मिला लेने के बाद इसकी सीमा मालवा तक जा पहुंची | शिशुनाग ने मगध की राजधानी वैशाली में स्थापित किया. शिशुनाग के पश्चात् उसका पुत्र कालाशोक सम्राट बना इसके शासनकाल में वैशाली में बौध्द धर्म की द्वितीय संगीति आयोगित की गयी | नन्दिवर्धन या महानंदीन शिशुनाग वंश का अंतिम शासक हुआ |



नंदवंश (344 -324 ई.पू.) – मगध की सत्ता शिशुनाग वंश के पश्चात् नन्द वंश के हाथ में आ गयी नन्द वंश का संस्थापक महापद्मनंद था | नन्द वंश ने बिम्बसार तथा अजातशत्रु द्वारा डाली गयी नीव पर प्रथम वृहत मगध साम्राज्य की स्थापना की इन्होने पाटलिपुत्र को समस्त उत्तरी भारत का केंद्र बना दिया इस वंश का अंतिम शासक घनानंद था जिसको मारकर चन्द्रगुप्त मौर्य ने मौर्य वंश की स्थापना की |  
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महत्वपूर्ण बौध्द संगीतियां उनके स्थान, समय, शासनकाल, अध्यक्ष एवं उद्देश्य


प्रथम बौध्द संगीति

स्थान     – सप्तपर्णी विहार (राजगृह)
समय     – 483 बी.सी.
शासनकाल – अजातशत्रु
अध्यक्ष    – महाकश्यप
कार्य      – बुध्द की शिक्षाओं को सुतपिटक व विनय पिटक में संकलन किया गया

द्वितीय बौध्द संगीति

स्थान     – वैशाली
समय     – 383 बी. सी.
शासनकाल – काला शोक
अध्यक्ष    –   साबकमीर सर्वकमी
कार्य      – संघ का स्थाविर एवं महासान्धिक में विभाजन



तृतीय बौध्द संगीति

स्थान     – पाटलिपुत्र
समय     – 251 बी. सी.
शासनकाल – अशोक
अध्यक्ष    –  मोगलिपुत्र तिस्स
कार्य      – अभिधम्मपिटक का संकलन एवं भेद अलग – अलग रोकने हेतु कठोर नियम

 
चतुर्थ बौध्द संगीति

स्थान       – कुण्डलवन
समय       – प्रथम शती ई.
शासनकाल   – कनिष्क
अध्यक्ष      –  वसुमित्र
उपाध्क्ष      – अश्वघोष
विशेष अतिथि – नागार्जुन
धर्म         – विभाषाशास्त्र नामक टीका का संस्कृत में संकलन तथा संघ का हीनयान महायान में विभाजन


पंचम बौध्द संगीति

स्थान     – कन्नौज
समय     – सातवीं सदी के लगभग
शासनकाल – हर्षवर्धन
अध्यक्ष    –  हेन्सांग
कार्य      – महायान सम्प्रदाय की श्रेष्ठता स्थापित, कन्नौज में विशाल संघ सभा का निर्माण

षष्ठी बौध्द संगीति

स्थान     – कन्नौज
समय     – सातवी सदी
शासनकाल – हर्षवर्धन
अध्यक्ष    –  हेन्सांग
कार्य      – बुध्द, सूर्य एवं शिव तीनो देवताओं की आराधना






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बौध्द धर्म का उत्थान एवं गौतम बुध्द का परिचय व महत्वपूर्ण जानकारियां


बौध्द धर्म के संस्थापक गौतम बुद्ध का जन्म 563 ई.पू. में कपिलवस्तु के निकट लुम्बिनी (नेपाल की तराई) में शाक्य क्षत्रिय कुल में हुआ था | इनके पिता शुध्दोधन शाक्य गण के मुखिया थे उनकी माता का नाम महामाया था | उनके बचपन का नाम सिध्दार्थ था | बचपन से ही उनका ध्यान आध्यात्मिक चिन्तन की ओर था. शीघ्र ही उनका विवाह यशोधरा से करा दिया गया, पर दाम्पत्य जीवन में उनका मन नही रमा इसलिए वे लोगों के सांसारिक दुःख देखकर द्रवित हो जाते और ऐसे दुखों के निवारण का उपाय सोचने लगते. 29 वर्ष की अवस्था में ये ज्ञान की प्राप्ति के लिए घर से निकल पड़े तथा सात वर्षों तक इधर-उधर भटकते रहे. 35 वर्ष की उम्र में बोध गया में एक पीपल के पेड़ के नीचे इन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ और तभी से वे बुध्द अर्थात प्रज्ञावान कहलाने लगे |

महात्मा बुध्द ने अपने ज्ञान का प्रथम उपदेश सारनाथ  में दिया जिसे धर्मचक्र प्रवर्तन कहा जाता है. 80 वर्ष की उम्र में 483 ई.पू. में कुशीनगर नामक स्थान में ये महापरिनिर्वाण को प्राप्त हुए |



बौध्द धर्म की शिक्षाएं तथा सिध्दांत – बौध धर्म की शिक्षाओं का मुख्य आधार है चार आर्य सत्य –
    (1)    दुःख 
  (2) दुःख समुदाय 
  (3) दुःख निरोध 
  (4) दुःख निरोध-गामिनी-प्रातिप्दा अर्थात अष्टांगिक मार्ग

बौध्द धर्म मूलतः अनीस्वरवादी है इसमें सृष्टी का कर्ण ईस्वर को नही माना गया है तथा इसी प्रकार बौध्द धर्म में आत्मा की परिकल्पना भी नही है | बौध्द धर्म ले इन अनात्मवाद के सिध्दांत के अंतर्गत यह मान्यता है की व्यक्ति की जो आत्मा है वह उसकी म्रत्यु के साथ ही समाप्त हो जाती है. बौध्द धर्म में पुनर्जन्म की मान्यता है बौध धर्म के अनुसार मनुष्य के जीवन का चरम लक्ष्य है निर्वाण प्राप्ति | निर्वाण प्राप्ति के लिए सदाचार तथा नैतिक जीवन पर बुध्द ने अत्यधिक बल दिया है | दस शीलों का अनुशीलन मानव के नैतिक जीवन का आधार है ये दस शील है –

   (1)    अहिंसा
   (2)    सत्य
   (3)    अस्तेय
   (4)    व्यभिचार न करना
   (5)    मद्य का सेवन न करना
   (6)    असमय भोजन न करना
   (7)    सुखप्रद बिस्तर पर न सोना
   (8)    धन संचय न करना 
   (9)    स्त्रियों का संसर्ग न करना
  (10) अपरिग्रह

   
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